ज्ञान का अधिकारी कौन यह जान गये तो जीवन स्वर्ग बन जायेगा

बहुत से व्यक्तियों ने हमारे सनातन धर्म के विषय मे कुप्रचार किया कि शिक्षा मात्र उच्च कुल को दे जाती थी अन्य कुलो को नही दी जाती थी आज मैं आपको सब को वो कथा बताना चाहती हूँ कि कुल या गोत्र का शिक्षा ग्रहण या प्रदान करने से कोई लेना देना नही था जिसको ज्ञान प्राप्त करना था वो कर सकता था उसकी ज्ञान पिपासा बड़ी होनी चाहिए थी प्राचीन काल मे कर्म से वर्ण निर्धारित किये जाते थे जन्म से नही।

  • मेरी पसंदीदा सत्यकाम जाबाल की कथा है, येकथा छान्दोग्य उपनिषद में दी गयी है।
  • ये नन्हा बालक बहुत जिज्ञासु थाजहाँ मंत्र उच्चारण चलता हुआ देखता उधर चला जाता और उसको दोहरा कर कंठस्थ करने का प्रयास करता।
  • एक दिन उस के नगर में ऋषि गौतमआये वो स्नान करने नदी पर गए तो वहाँ घाट पर उस बालक को देखा जो कोई मंत्र दुहरा रहा था गौतम ऋषि त्रिकालदर्शी थे उन्होंने तुरंत उस बालक के विषय ने सबकुछ जान लिया कि ये कोई साधारण बालक नही है।
  • उसको अपने पास बुलाया और उसका परिचय पूछाउसने अपना परिचय बताया कि वो जबाला का पुत्र जाबाल है, तो ऋषि ने कहा,” पुत्र तुम बहुत जिज्ञासु और बुद्धिमान प्रतीत होते हो अपना गोत्र बताओ मुझे तुम्हे अपना शिष्य बना कर आनंद प्राप्त होगा
  • उस बच्चे ने उत्तर दिया,”ऋषिवर गोत्र मुझे ज्ञात नही अभी माता से पूछ कर बताता हूँ “
  • वो भाग कर माता के पास आया माता एक दासी थी स्थान स्थान पर कार्य कर जीवन यापन करती थी, बालक ने माता से ये सब प्रकरण बताया और अपना गोत्र पूछ लिया ।
  • माता ने कहा ,” जाओ पुत्र, ऋषि से कहना कि मेरी माता जबाला एक दासी है सब स्थानों पर सभी प्रकार से सेवा करती थी उन्ही दिनों मेरा जन्म हुआ तो मेरी माता को ज्ञात नही कि मेरे पिता कौन है और उनका गोत्र क्या था???”
  • बालक ने अक्षरशः यही बात ऋषि को बता दी ऋषि ने कहा मुझे तुम्हारी योग्यता पर पूर्ण विश्वास है आज से मैं तुम्हे नया नाम देता हूँ, सत्यकाम जाबाल”
  • इस प्रकारवो बालक गुरु औऱ नया नाम मिल जाने से बहुत प्रसन्न हुआ अपनी माता से आज्ञा ले कर गुरुकुल जा पहुंचा।
  • लगभग दो या तीन वर्ष तक वो गुरु जी की सेवा करता रहा तोगुरु जी ने उसकी परीक्षा लेने का निर्णय किया उसको चार सौ गाय दी और कहा सत्यकाम जाबाल जब ये गाय एक सहस्त्र हो जाये तब मेरे पास आ जाना।
  • उस समय परीक्षा आज के समान नही होती थी गुरु बहुत कठिन माध्यमो से अपने शिष्यों को आँकते थे।
  • सत्यकामउन्हें ले कर जंगल मे ऐसे स्थान और पहुँच गया जहाँ हरियाली और जल प्रचुर मात्रा में था कई वर्षों तक वो सिंहो व्याघ्रों आदि से अपनी गायो की रक्षा करता रहा इतनी तल्लीनता से कार्य करता था कि अपनी भी सुधबुध खो जाती थी।
  • एक दिन अचानकएक बैल मनुष्यों की भांति बोला हम एक सहस्त्र हो गए हैं अब हमें गुरु जी के पास ले चलो और बैल ने ज्ञान की कई बातें सिखाई , सत्यकाम जाबाल अगले दिन भोर होते ही अपनी गायों को ले कर चला।
  • मार्ग ने अंधेरा होने पर एक स्थान पर रुक गया वहाँ आग जलाई तोअग्निदेव प्रकट हुए सत्यकाम को ज्ञान दिया और बताया कल का ज्ञान एक हंस देगा।
  • तीसरे दिन का ज्ञान हंस ने दिया उसने बताया कि तुमनेसच्चे ह्रदय से गुरु आज्ञा का पालन किया तुम्हारा हॄदय साफ हैं अब कल एक जलमुर्ग ज्ञान देगा।
  • चौथे दिन का ज्ञान जलमुर्ग ने दिया इस प्रकारगुरु के आश्रम तक पहुंचने तक सत्यकाम जाबाल मात्र चार दिन में ब्रह्मज्ञानी बन गया था उसके मुख मंडल पर ज्ञान की आभा दमक रही थी।
  • सत्यकामआश्रम आया गुरु माता और गुरु जी उसे देख कर अति प्रसन्न हुए गुरु जी तो त्रिकाल दर्शी थे उन्हें ज्ञात था मार्ग में क्या क्या हुआ फिर भी परिहास में बोले, “वत्स तू तो बड़ा ज्ञानी लग रहा है अवश्य किसी और से ज्ञान ले कर आया है”।
  • जाबाल अपने गुरु के चरणो में गिर कर बोला आप ही मेरे गुरु है मार्ग में कुछजीव मिले जो मनुष्य नही थे उन्होंने मुझे अवश्य ज्ञान दिया आप के ज्ञान दिए बिना मेरा उद्धार नही होगा फिर गुरु जी ने सत्यकाम जाबाल को और भी ज्ञान की बातें सिखाई
  • गुरु जी ने अपने अन्यशिष्यों को बताया कि सत्यकाम जाबाल ने गुरु की आज्ञा पूर्ण की और बिना वेद के अध्ययन के बिना पठन पाठन के समस्त ज्ञान प्राप्त किया है , इसके ज्ञान देने के लिए बैल हंस औऱ जलमुर्ग आये थे।
  • शिष्यों को अपने आप बड़ी ग्लानि हुई जो वर्षो से मात्र वेदों के अध्ययन और पठन पाठन को ज्ञान मान बैठे थे असली ज्ञान तो जाबाल ने जंगल में रह कर प्राप्त कर लिया।
  • गौतम ऋषि ने सत्यकाम जाबाल को अपने आश्रम का आचार्य बना दियाऔर स्वयं अपनी धर्मपत्नी के साथ तपस्या के लिए चले गए।
  • ऐसे महान गुरु और ऐसे सच्चे शिष्य को कोटि कोटि नमन
  • सच्चा ज्ञान गुरु की आज्ञा के सच्चे हॄदय से पालन से मिल जाता है उसमें कोई प्रयास नही करना पड़ता।

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