Home Uncategorized हनुमान जी की मूर्ति ने 16 साल बाद किया चमत्कार

हनुमान जी की मूर्ति ने 16 साल बाद किया चमत्कार

नमस्कार दोस्तों आप सभी लोगों का हमारे लेख में स्वागत है दोस्तों आपको बता दें कि गंगा दशहरा के पर्व पर हनुमान जी ने अपने श्रद्धालुओं को दर्शन दिए हैं आपको बता दें कि करीब 23 हज़ार वर्ष पुराने हनुमान मंदिर की प्रतिमा ने 16 वर्ष बाद चोला छोड़ दिया है हनुमान जी के वास्तविक स्वरुप के दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी रही थी आपको बता दें कि चोला का भार लगभग 30 से 35 किलो तक बताया जा रहा है हनुमान जी के वास्तविक प्रतिमा के दर्शन बहुत ही कम व्यक्तियों को ही हो पाते हैं इस मंदिर के महंत जगजीवन राम मिश्र जी का कहना है कि लगभग 23 हज़ार वर्ष पहले फिरोजाबाद शहर में मंदिर के स्थान पर एक खंडहर हुआ करता था आबादी के नाम पर यहां विरानी सड़के दिखाई पड़ती थी इस स्थान पर साधु महात्माओं का डेरा हुआ करता था पेड़ की छांव में सैकड़ों साधु महात्मा तपस्या करते थे इस स्थान पर महात्माओं ने तप करने के लिए गुफा भी खुदवा रखी थी।

आपको बता दें कि जमीन से यह हनुमानजी की प्रतिमा निकली थी उस दौरान महात्माओं ने इस मूर्ति को ऐसे ही यहां पर स्थापित कर दिया था उस दौरान यह जगह टीले के रूप में परिवर्तित थी इसी वजह से यहां पर कोई भी व्यक्ति आने से डरता था यहां के महंत बताते हैं कि हनुमानजी की प्रतिमा चलने की मुद्रा में है प्रतिमा में उनकी एक आंख ही नजर आ रही है उनके दोनों पैर एक दूसरे के विपरीत आकार में है उनके कंधे पर भगवान राम जी और लक्ष्मण जी विराजमान हैं उनके हाथ में चक्र और गधा भी मौजूद है इन सभी को लेकर यह माना जा रहा है कि जब अहिरावण ने राम और लक्ष्मण को बंदी बना लिया था तब वह उनकी बलि देने की तैयारी कर रहे थे तब हनुमान जी ने अहिरावण का वध करके बचाया था उसी समय के दौरान उन्होंने चक्र भी धारण किया।

आपको बता दें कि यहां के महंत का ऐसा कहना है कि इस मंदिर में ग्वालियर के राजा सिंधिया भी यहां भगवान की शरण में आया करते थे और भगवान शिव जी ने इसी मंदिर में काफी लंबे समय तक गोरिल्ला युद्ध किया था जंगलों में रहने के दौरान शिवजी ने यहां हनुमान जी की शरण ली थी ऐसा भी बताया जाता है कि हनुमानजी की प्रतिमा चमत्कारी है यह 18 से 20 वर्ष पश्चात खुद ही अपने ऊपर लगे चोले को छोड़ देती है इसके पश्चात भगवान के प्राकृतिक स्वरूप के दर्शन होते हैं चोला छोड़ने के पश्चात उनके शरीर पर एक बूंद भी सिंदूर शेष नहीं बच जाता है अभी वर्ष 2002 में चोला छोड़ा था जिसका वजन लगभग 40 किलो था और इस चोले को हरिद्वार गंगा में प्रवाहित किया गया।