शेषनाग कैसे बना भगवान विष्णु की आराम शय्या, क्या हैं उसका गरूड़ से कनेक्शन, पढ़े दिलचस्प कहानी

हिंदू धर्म में कई सारे देवी देवताओं का जिक्र हैं. इन हर एक देवी देवताओं से जुड़ी बहुत सी कहानियां भी हैं. एक बात यदि आप ने नोटिस की हो तो इनके पास अपना एक विशेष वाहन भी होता हैं. जैसे गणेशजी का वाहन चूहा हैं तो शिवजी का नंदी(बैल) हैं. इसी कड़ी में भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ पक्षी हैं. जब से गरुड़ को विष्णुजी के वाहन का दर्जा प्राप्त हुआ हैं तब से उसे पक्षी राज भी कहा जाने लगा हैं. वैसे गरुड़ के अतिरिक्त भगवान विष्णु का एक और वाहन हैं जिस पर वे भ्रमण तो नहीं करते लेकिन आराम जरूर करते हैं. आप ने विष्णुजी की कई ऐसी तस्वीरें देखी होगी जिसमे वे शेषनाग को शय्या बनाकर उस पर आराम कर रहे होते हैं. ऐसे में क्या आप ने कभी सोचा हैं कि आखिर भगवान विष्णु ने अपनी शय्या के रूप में शेषनाग को ही क्यों चुना? दरअसल इसके पीछे एक बड़ी ही दिलचस्प कहानी हैं जो आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं.

दक्ष प्रजापति की कद्रू और विनता नाम की दो बेटियां थी. उन्होंने इन दोनों का ही विवाह कश्यप ऋषि के साथ किया था. शादी के बाद कद्रू ने अपने पति कश्यप ऋषि से वरदान में एक हजार नाग पुत्रों की मांग की जबकि उनकी दूसरी पत्नी विनता ने सिर्फ दो तेजस्वी पुत्र मांगे. इसके बाद कद्रू ने एक हजार अंडे दिए जबकि विनता ने सिर्फ दो अंडे दिए. कद्रू के अंडे पहले फूटे और उसमे से एक हजार नाग पुत्र पैदा हुए. इस बात से उतावली होकर विनता ने समय से पहले ही अपना एक अंडा फोड़ दिया. लेकिन उसमे से जो बच्चा निकला उसका निचे का धड़ ही नहीं था. बच्चे ने क्रोधित होकर शाप दिया कि तुमने कच्चे अंडे तोड़े इसलिए अगले 500 वर्षों तक तुम अपनी सौत (कुद्रू) की दासी बनकर रहोगी. साथ ही बच्चे ने कहा कि अब अगले अंडे को अपने आप ही फूटने देना. इससे जो तेजस्वी बालक पैदा होगा वही तुम्हे शाप से मुक्ति दिलाएगा. इसके बाद अरुण नाम का वो बालक उड़कर सूर्यदेव की शरण में गया और उनके रथ का साथी बना.

गरूड़ ऐसे बना विष्णुजी का वाहन

इसके कुछ समय बाद विनता का दूसरा अंडा फुट और उसमे से अद्वितीय गति और तेजस्व वाला पुत्र गरूड़ निकला. एक बार कद्रू ने गरूड़ को आदेश दिया कि तुम मेरी दासी के पुत्र हो इसलिए मेरे बेटों को घुमाने ले जाओ. पहले तो गरूड़ को गुस्सा आया लेकिन फिर उसने सौतेली माँ की बात मान ली. नाग पुत्रों को घुमाते हुए गरूड़ ने उनसे कहा कि तुम मेरी माँ को शाप से मुक्ति दिलवा दो. इस पर नागो ने कहा कि यदि तुम हमें अमृत लाकर देते हो तो ऐसा संभव हैं. फिर गरूड़ ने इंद्र सहित कई देवताओं को पराजित किया और अमृत छीन लिया. गरूड़ की वीरता से प्रसन्न होकर इंद्रा ने उनसे दोस्ती की और अमृत ना ले जाने को कहा. इस पर गरूड़ ने कहा कि मैं बस अमृत वहां रखूँगा और माँ को शाप से मुक्त करूँगा इसके बाद आप चाहे तो इसे वापस ले जा सकते हैं. इसी बीच गरूड़ की भेट विष्णुजी से भी हुई. उनसे प्रसन्न होकर विष्णु ने गरुड़ को वरदान मांगने को कहा. गरूड़ ने फिर उनका वाहन बनने की इच्छा जाहिर की और इस तरह वे भगवान विष्णु के वाहन बन गए.

शेषनाग ऐसे बना भगवान विष्णु की शय्या

गरूड़ ने अमृत लाकर अपनी माँ विनता को शाप से मुक्त कर दिया. चुकी गरूड़ को ये अमृत अपने मित्र इंद्र को वापस लौटना था इसलिए उन्होंने इसे कुशा के आसन पर रख दिया ताकि नाग भाई इसे ना पी सके. बाद में जब सर्प आए तो उन्होंने अमृत पीने के चक्कर में कुशा को चाट लिया जिससे उनकी जीभ फट गई. जब उनकी माता कुद्रू को इस बात का पता लगा तो उसने क्रोधित होकर उन्हें शाप दिया कि तुम गरूड़ पक्षी का भोजन बनोगे. अहंकारी सांपो ने माँ के इस शाप की परवाह नहीं करी लेकिन उनमे एक शेष नाग नाम का सांप भी था. उसने कठोर ताप कर ब्रह्मा जी को अवतरित किया. जब बरह्मा ने वरदान माँगा तो शेषनाग ने कहा कि “मेरे भाई सांप मुर्ख हैं, मैं उनके साथ नहीं रहना चाहता हूँ. वे गरूड़ को दुश्मन मानते हैं जबकि वो तो मेरा ही भाई हैं.” शेषनाग की इस बात को सुन ब्रह्मा प्रसन्न हुए और उन्होंने वरदान में शेषनाग को भगवान विष्णु की आराम शय्या बना दिया ताकि उनका ध्यान भंग ना हो.

Leave a Reply

Your email address will not be published.